Thursday, March 29, 2012

प्रश्नचिन्ह..




पानी की लहर सतत आगे बढ़े जा रही थी. जहाँ लहर जमीन को अपना अंतिम प्रणाम कह के फिर किसी और लहर में मिलने को लौट जाती थी, मैं वहीँ पानी के सहारे सहारे लेटा हुआ था. अचानक से एक जोर से लहर आयी और मुझे पूरा झकझोर दिया. उठा तो खुद को बालकनी में आराम-कुर्सी पे बैठा पाया. उफ़..!! ये सपने भी, कभी कभी इतना दहका देते है कि जान हलक तक आ जाती है. आँखे मलते हुए मैंने सामने की छत पर देखा. सामने दो खम्भों के बीच प्लास्टिक के तार बंधे हुए थे, जो हमेशा कपड़ो से लदे रहते थे. आज पता नहीं क्यूँ वो तार खुश लग रहे थे. मद्धम-मद्धम हवा के साथ हिचकोले खा रहे थे. नित-रोज वो कपड़े धूप को उन्ही तक रोक लेते थे और अड़ोस-पड़ोस के घर ऐसे बने हुए थे कि हमारे घर की बालकनी तक तो धूप आ ही नहीं पाती थी. सर्दी में धूप सेकने के लिए फिर हमें भी छत पर जाना पड़ता था. आज उन कपड़ो की गैर-मौजूदगी में कुछ मील दूर शहर की पहरेदारी करते उन पहाड़ों पर नज़र गयी. सुबह हौले-हौले से पहाड़ों पर उतर रही थी. धीमे से ना जाने कब मेरी पलकों पर चढ़ गयी और मेरी नींद को तहस-नहस कर दिया.

बेटा रोहन”..!! काल्पनिक और वास्तविक दुनिया में उलझा हुआ था और पिताजी की आवाज़ आयी. जी आया पिताजी”.. मैं अभी कुर्सी से उठा ही था कि वो बोले, “बेटा, सुबह-सुबह ताजे अखबार के साथ अगर तुम्हारे हाथ की बनी चाय की चुस्की लग जाती तो मेरी सुबह पूरी हो जाती”. पिताजी को मेरे हाथ की चाय बड़ी सुहाती थी. बड़े से बड़े, अच्छे से अच्छे रेस्तरां में ले जा के उन्हें महंगी से महँगी चाय पिलाई पर एक चुस्की के बाद कहते नहीं बेटा.. इसमें वो चाय का कडकपन और वो प्यार नहीं है जो तुम्हारे माँ के हाथों में था. ये कला तुम्हे उस से विरासत में मिली हैं..और मेरा सीना गर्व से चार गज का हो जाता.

जहाँ जायके की बात आ जाती वहाँ पिताजी को माँ की कमी का एहसास होता और चूँकि माँ मुझे जन्म देते ही इस संसार से विदा हो गयी तो मुझे तो माँ के बारे में कुछ पता ही नहीं था. बस तस्वीरों में माँ की आँखे, उनकी मुस्कराहट को बातो में ढाल कर मैं उनसे बाते किया करता था. माँ को अपनी कल्पना के बादलों में नहलाकर अनुमान लगाता था कि माँ ऐसी रही होंगी. थोड़े समय तक तो पिताजी ने मुझे मासी के पास छोड़ दिया ये सोच के कि इस नन्ही बिन माँ की जान को माँ का प्यार कैसे दे पाउँगा. परन्तु चंद महीनों में ही मेरे बिना वो रह नहीं पाए और मुझे अपने साथ ले आये. फिर जब से मुझे समझ आने लगी तब पिताजी का एकाकीपन मुझे इशारों-इशारों में पुकारता था. मैं घर के कामों में उनकी सहायता करने लगा. बीते बीस सालों में पिताजी ने मुझे कभी भी माँ की कमी नहीं खलने दी. हर एक बात में माँ को इस तरह ले आते थे कि जैसे माँ हमारे साथ ही हैं, और हमें देख रही है. अक्सर पिताजी कहा करते थे कि उसे मेरा इतना ख़याल था कि जाते जाते तुझ में वो सारे गुण और वो सारी बातें उड़ेल गयी कि मुझे कब क्या चाहिए और क्या नहीं.. उसे मेरी इतनी फिकर थी और कभी ये जानने की कोशिश नहीं की कि मुझे उसकी कितनी फिकर थी..और इतना कहते-कहते उनकी आँखों से आंसू की दो बूँद उनके गालों पर लुढक पड़ती. समानांतर मैं अपने सैलाब को अपनी आँखों में समेट कर माँ-पिताजी की उस तस्वीर में खुद को किसी कोने में खड़ा देखता.

"
बेटा आज अदरक थोड़ी कम डालना. सुबह-सुबह मुँह कसैला हो जाता है तो दिनभर मुँह का स्वाद बिगड़ा रहता है." पिताजी भी ना, रोज-रोज नए प्रयोग कराते है. कभी शक्कर कम डालना, कभी चाय की पत्ती ज्यादा डालना. दो लोगो की चाय में चीनी कम-पत्ती ज्यादा कितना नाप-तोल के डालें, पर नहीं. चाय का स्वाद जैसा होता है वैसा ही होना चाहिए. पर पारखी को तो हर चीज में निपुणता चाहिए होती है क्यूँ कि वो खुद इतना निपुण है उस चीज में तो दुसरे से भी उतना ही उम्मीद करता है. जब जब भी मैं इस मामले में कोई गलती करता था, उसी वक़्त वो उनके ज़माने की सैर करा देते थे. वो मुझे बताया करते थे कि कैसे वो अपने ज़माने के पाक-शास्त्री थे. उनके सरे मित्र उनके हाथ के बने खाने के कायल थे. कॉलेज समय में सप्ताहंत में एक दिन पिताजी के नाम का होता था जब पिताजी खाना बनाया करते थे. माँ खुद इनके हाथ के खाने की बहुत बड़ी प्रशंसक थी. शादी के बाद माँ की फरमाइश पे उनकी पसंद का खाना बनता था. माँ जब भी रूठ जाया करती थी तो पिताजी का राम-बाण हुआ करता था ये. फिर पिताजी और माँ का रूठना मानाने का सिलसिला चालू होता. इन बातों में भी पिताजी  इतनी छौंक लगा के बताते थे कि मैं बस एकटकी लगाये उनकी बातों में खो जाता था.

मैं बचपन में अक्सर पिताजी से पूछा करता था कि क्या माँ इतनी निष्ठुर हो गयी थी कि अपनी खुद की जिंदगी का सौदा मेरी जिंदगी और आपकी जिंदगी के साथ कर बैठी. क्या उन्होंने ये नहीं सोचा कि उनके बिना आप अकेले कैसे जी पाएंगे..? और पिताजी उपर से बनते हुए मुझे समझाते कि बेटा, तुम्हारी माँ निष्ठुर नहीं थी. मुझे पता है उन नौ महीनों में तुझे कितने प्यार से पाला है, इतना प्यार कि शायद अगर वो जिंदा होती तो उम्रभर तुझे इतना स्नेह नहीं दे पाती..फिर हँसते हुए पिताजी कहते कभी कभी तो मुझे इर्ष्या होने लगती कि उसका प्यार अब हम दोनों में बंट रहा है.और ये कहते हुए पिताजी मुझे अपने कंधे पर उठा पूरे घर में घुमा घुमा के मुझे माँ के बारे में बताते थे. पिताजी में वो जादू था, बात को छेड़ कर तरह-तरह के मोड़ से गुजारते हुए इस तरह से गायब कर देते थे कि मुझे भनक भी नहीं लगती कब बात खतम हो गयी.

छन्न-छन्न की आवाज़ के साथ मेरी तन्द्रा टूटी तो देखा कि चाय उफन के गैस पे फ़ैल गयी थी. बरामदे से आवाज़ आयी  "क्या हुआ..?? फिर से चाय फैला दी. कोई सा तो काम ढंग से पूरा कर लिया कर."  इस से पहले कि पिताजी ये देखे मैं कपड़ा ढूंढने लगा. एक बार याद है मुझे जब पिताजी रसोई में खाना बना रहे थे और मैं उन्हें हाथ बंटाने के मकसद से आया था, पर तेल की कड़ाही में पानी गिर गया मेरे हाथ से फिर क्या था, सारा उबलता हुआ तेल पानी लगते ही ज्वालामुखी बन बैठा और लगभग पिताजी और मैं झुलसते झुलसते बचे. जैसे तैसे पिताजी ने कड़ाही को ठीक किया और पिल पड़े मुझ पर. और गुस्सा होना भी लाज़मी था, अभी जल जाते उस खौलते तेल से तो बैठे बिठाये लेने के देने पड़ जाते. और वो पहली बार था जब पिताजी का मुझ पर हाथ उठा था. जिस कोमल हाथ ने ना जाने कितनी बार मेरे गाल सहलाये थे, सर पर आशीर्वाद रखा था वही हाथ उस दिन पहली बार पत्थर से भी ज्यादा कठोर जान पड़ा और वो वज्र जैसा हाथ सीधा आके मेरे गाल पे लगा. मैं लड़खड़ाते हुए जैसे तैसे संभला, फिर गाल पर हाथ रखे वहीँ खड़ा हो गया. एक भी आंसू नहीं निकला मेरी आँख से, पर वो थप्पड़ गाल पर लगने से ज्यादा दिल पे लगा था. एक तो मैं उनका काम बाँटने गया और बदले में एक थप्पड़. हालांकि समझ की कमी ने मुझे उस वक़्त कुछ सोचने नहीं दिया. परन्तु उस समय के लिए एक गुस्सा सा पैदा हो गया था उस बाल मन में. कुछ दिन मैंने पिताजी से बात नहीं की. वो सुबह उठकर मेरा टिफिन तैयार करते और मैं बिना टिफिन उठाये ही स्कूल के लिए निकल लेता.  फिर पिताजी को शायद लगने लगा कि आवेश में आकर हाथ नहीं उठाना चाहिए था. और यहीं से सिलसिला चालू हुआ उनका मुझे मनाने का. स्कूल बस के बजाय मुझे स्कूटर पे छोड़ने जाते, लेने को आते, मेरी मन पसंद चीजे दोनों वक्त खाने में होने लगी. उन चंद दिनों में मैंने हर वो मिठाई पेट भर के खायी जो मुझे बहुत पसंद थी. मेरे बालमन को इस खेल में अब मजा आने लगा. पर पिताजी से कब तक नाराज़ रहता. कुछ ही दिनों में फिर से वही दोस्ती.

चाय को दो कपों में डाल के ट्रे में रख कर मेरी निगाहें बिस्किट ढूंढ रही थी. सब डिब्बे खंगाल दिए किसी में न मिले. कब से मन में ये डर था कि पिताजी चाय के लिए अब पूछेंगे- अब पूछेंगे. आखिरकार चाय ठंडी होने के डर से मैं बिना बिस्किट के ही रसोयी से निकल गया. पिताजी.. चाय ठंडी हो रही है..मैं हॉल में आते से पिताजी को आवाज़ लगायी. कोई प्रतिउत्तर नहीं मिला. उन्हें ढूंढती हुयी मेरी नज़रें इधर-उधर ताक रही थी. इतने में सामने वाली दीवार पे मेरी निगाह गयी. सामने पिताजी की तस्वीर फूलों के हार से सुसज्जित थी. ये देख के एक पल के लिए मेरी रगों में जैसे प्रलय आ गया हो. कुछ क्षण के लिए अपलक उस तस्वीर को निहारते हुए पिताजी के बारहवे के सारे पल मेरे मन-मस्तिष्क में डोले खाने लगे. आज पिताजी को इस दुनिया से गए हुए 12 दिन हो गए है पर ऐसा लगता है कि अभी भी मुझे रोज की सुबह की तरह चाय बनाने को कहते हो. रह-रह कर ये सवाल मेरे मन में उठ रहा था कि क्यूँ पिताजी.. आखिर क्यूँ.. मुझे आप इस दुनिया में अकेले छोड़ कर चले गए?? आप के सिवा था ही कौन मेरा यहाँ..? आप माँ को स्वार्थी कहते थे.. कि वो मेरे लिए आपको अकेला छोड़ के चली गयी. अब मैं आपको क्या कहूँ..?? जिस नन्ही जान को माँ आपके भरोसे छोड़ गयी थी, आप भी उसे इस तरह अकेला छोड़ गए, क्या मुहँ लेके जाओगे माँ के पास..??

ये सोचते सोचते वो सैलाब जिसे मैं बहुत देर से रोके बैठा हुआ था, फट पड़ा. माँ.. पिताजी को कुछ मत कहना माँ.. उन्होंने बखूबी मेरा खयाल रखा. इन 20 सालों में मुझे कभी भी तुम्हारी कमी महसूस नहीं होने दी. पिताजी को कुछ मत कहना...!!और कमरे में फफक-फफक के रोने की आवाजे गूंजने लगी…!!

Friday, March 16, 2012

समझ बैठा..





तेरी पलकें देख कर, मैंने मुड़ के देखा,
मैं काज़ल को घटाएँ समझ बैठा..
होश में यूँ तो नहीं थी कोई कमी,
तेरी आँखों को गहरी झील समझ बैठा..
डूब के उसमे, मैं तुझसे मोहब्बत कर बैठा..!!

दमकते सितारे को, मैंने मुड़ के देखा,
मैं बिंदिया को चाँद समझ बैठा..
होश में यूँ तो नहीं थी कोई कमी,
पागल चकोर से तुझे संदेशा भेज बैठा..
इसी दरमियान, मैं तुझसे मोहब्बत कर बैठा..!!

झूलती जुल्फों को, मैंने मुड़ के देखा,
मैं उन लटों को बहती हवा समझ बैठा..
होश में यूँ तो नहीं थी कोई कमी,
उन हवा से खुद को झुलसा बैठा..
तड़प कर, मैं तुझसे मोहब्बत कर बैठा..!!

लटकती बाली को, मैंने मुड़ के देखा,
उन गहनों को मैं जुगनू समझ बैठा..
होश में यूँ तो नहीं थी कोई कमी, 
उन जुगनुओ के पीछे भाग बैठा..
अँधेरे में खो कर, मैं तुझसे मोहब्बत कर बैठा...!!!

Friday, February 10, 2012

वोटर की दास्ताँ..


अजी.. आजकल हमको भी सब नमस्कार करने लगे है,
वक्त का क्या कहे, लोग अंगूठी को कमर में पहनने लगे है..
लोग भलाई में बुराई ढूंढने लगे है,
नेता के ऊपर कुर्सी बैठाने लगे है..
ऐसे में एक दिन एक जनाब ने दरवाजा खटखटाया,
मैंने पूछा कौन है आया..?
वो बोला, 
साहेब आपका साथ चाहिए..
इलेक्शन में खड़ा हूँ, सर पे आपका हाथ चाहिए..
मैं हैरान-परेशान, दरवाजा खोला, 
4 इंच की मुस्कान लिए था कंधे पर झोला,  
वो सज्जन आदमी हाथ जोड़ के बोला..
सर जी आपका वोट चाहिए,
मैंने कहा भाई बाद में आ जाइये..
वो 500 का नोट निकाल के बोला साहेब वोट चाहिए..
मैं बोला किराने की दूकान नहीं है, जो नोट के बदले कुछ दूंगा..    
menifesto दिखा, फिर सोच के वोट दूंगा..
ये सुन वो कुटिल सी हंसी देकर बोलने लगा,
मैं ये करा दूंगा, मैं वो करा दूंगा..
दुनिया को इधर से उधर कर दूंगा..
अचानक उसे क्या सूझा,
वो सीधे वर्तमान को इतिहास में ले घुसा.. 
याद है हम फलाना प्रोफेसर की क्लास में 
आगे पीछे बैठा करते थे,
उन दिनों हम लंगोटिया यार हुआ करते थे..
मेरी आँखे जैसे पृथ्वी अपने अक्ष पे घुमती हो
इतनी जोर से घुमने लगी,
मैं सोचू गाडी कब से गधे को खींचने लगी..
मेरी शकल देख उसे समझ में आने लगा,
कि एक और मरीज़ उसके वश में आने लगा..  
फिर वो जाते जाते बोला, क्या साहेब, अब तो वोट दोगे?
अब वोट देने का क्या लोगे..
जैसे ही हाँ बोला वो बिना मुड़े चलने लगा,
मानो ज्वालामुखी से ice-cream निकलने लगा.. 
मेरे अन्दर आते ही पडोसी का दरवाजा बजा
उसकी बीवी चिल्लाई क्या चाहिए..
दूसरी आवाज़ आयी.. मेडम वोट चाहिए..!!

Friday, February 3, 2012

पणिहारी..




मटका
सर पे लादे वो,
निकली पानी भरने को..
कभी
नाक की बाली,
कभी बालों की लट,
हंसी ठिठोली करती 
उकसाती उसे चलने को..!! 
शैतान घड़ा
करे परेशान बड़ा,
छलक-छलक के,
ढूलक-ढूलक के,
उसे नहलाने को आतुर 
पानी के छींटो से..!!
रंग-बिरंगी इडूणी,
पानी से
झर-झर करती,
जैसे
बारिश की बूंदे,
टप-टप, टप-टप,
टप-टप करती..!!
पानी के रेले
चेहरे से झरते,
ओढ़नी को उसकी,
जैसे  
बादल समझ बैठे..
हैरान सी वो 
बेहाल सी वो
मगर फिर भी 
वो मटकाती
वो मुस्काती
बस नैनों से 
कुछ कह जाती..!!

Tuesday, November 1, 2011

पुकार..


देश की आवाज़ सुनो, देश की पुकार सुनो..
बिलखते अलाप सा, हिंदुस्तान का राग सुनो..
आंसू इसके पोंछ दो, इसको कोई सहारा दो,
अरे कोई तो खड़ा हो, अरे कोई तो दहाड़ दो.. कोई तो दहाड़ दो..!!

भ्रष्ट ये इंसान है, नष्ट नेताचार है,
महाकाल के देश में, क्यूँ ये भ्रष्टाचार है..
कहाँ गए वो राम-लखन,  इन्हें कोई जनम दो,
अरे दानवों की भीड़ को, अब तो संहार दो.. अब तो संहार दो..!!

दंगे-फसाद में, ज़ख़्मी है इंसानियत,
अबला नारी पे बिगड़ी, आदमी की नीयत..
द्रोपदी की लाज बचाते, कोई कृष्ण को गुहार दो,
प्रेम-नैय्या थाम कर, अब जगत को उद्धार दो.. जगत को उद्धार दो..!!

धमाको से सुन्न ये कैसा अन्धकार है,
आतंकवाद की आग में, मच रहा हाहाकार है..
कहाँ है वो यीशु, कहाँ गए पैगम्बर वो,
शांति सन्देश फूंक कर, हमें अमन-चैन दो.. हमें अमन-चैन दो..!!

भूख ने मार दी, देशभक्ति की भावना,
कब तक जिंदा रहती, रोटी की कामना..
न्याय की मूर्ती, न देख पाती तराजू उसका,
कोई पट्टी उतार के, देख के इन्साफ करो, देख के इन्साफ करो..!!

‘इनक्रेडिबल इंडिया’ का तमगा, लगाये हम घूमते है,
महंगाई की मार से, तड़प-तड़प के झूझते है..
परदे पर सतरंगी दिखता, भारत कितना महान है,
चश्मा पोंछ के देखो, धुंधला ये  जहान है.. धुंधला ये  जहान है..!!

Sunday, August 7, 2011

मैत्री..





वो भीनी भीनी सी यादें..
दिल-ओ-दिमाग में महकती सी..
बरबस उस ओर मुझे खींचे ले चले,
जहाँ जुगनुओं के टिमटिमाते से, है चिरागों की रोशनी..
उन चिरागों में, जिन्नी नहीं मेरा मित्र रहता है..
उन शामियानों में, कोई अनजाना नहीं मेरा यार रहता है..
वो खामोश सी खुशबू के, होंट छूती तितली सा,
वो पत्तो कि ओंट में, छुपी हुई कलि सा.. 
जो अंगुलियाँ उठ जाती है मुझ पर,
उन्ही अँगुलियों से राह दिखाते राही सा..
वो सूरज की किरण सा दमकता,
वो सुबह की नम आब सा बहकता,
जब दिलों में खून उबलता था,
ठन्डे चिथड़ों सी उसकी बाते बतलाता..
कड़वी बातों की चुभन से परेशान मैं,
तेरी बातों की गुदगुदी से हैरान मैं..
मेरी तन्हाई में मेरे संग बैठ तू,
मुझे ज़रा उठने में सहारा दे तू...!!

Friday, April 29, 2011

तुम और मैं..



कुछ दिन बनो मेरी आँखों की पलक,
                                                      फिर अगर ख्वाब हो जाओ तो क्या..
कभी बन जाओ मेरी चाहत का फलक, 
                                                      फिर अगर सितारा हो जाओ तो क्या..
चाँद बदलता है, सितारे बदल जाते है,
                                                      कहने को तो सूरज भी बदल जाता है,
दुनिया जैसी ही है तुम्हारी भी झलक,
                                                      फिर अगर तुमसे आस लगाऊ तो क्या...
कुछ दिन बनो मेरी आँखों की पलक,
                                                      फिर अगर ख्वाब हो जाओ तो क्या...!!


मैं तन्हा था, मैं तन्हा हूँ, 
                                   तुम आ जाओ तो मैं आबाद, ना आओ तो मैं क्या..
तुम इत्र हो, तुम महक हो,
                                   तुम आ जाओ तो मैं गुलाब, ना आओ तो मैं क्या..
मेरे दिल के दिए की रोशनी तुम,
                                   मेरी ज़िन्दगी का आफताब हो तुम,
जब देखने वाला ही कोई नहीं, 
                                   डूब जाओ तो क्या, बुझ जाओ तो क्या...
कुछ दिन बनो मेरी आँखों की पलक,
                                   फिर अगर ख्वाब हो जाओ तो क्या...!!

Tuesday, March 8, 2011

एक दुआ ऐसी भी..




ऐ बदनसीब मेरी दुआ से तुझे भी किसी से इश्क हो जाये..
तू प्यार में पागल हो और फिर उस से जुदा हो जाये..
आँखों में हरदम आंसू हो और लबों पर मायूसी आ जाये..
मोहब्बत में तड़पना क्या है.. शायद तुझे समझ में आ जाये...
ऐ बदनसीब मेरी दुआ से तुझे भी किसी से इश्क हो जाये...!!

जब भी तू अपनी चाहत को बीच राह पर देखे,
वो तुझे देखे और फिर अनदेखा कर जाये..
बैचेनी कुछ ऐसी हो कि तू मिलने की हरदम चाह करे,
तू उसके घर की ओर रुख करे और रास्ते भी बदल जाये..
मोहब्बत में तड़पना क्या है.. शायद तुझे समझ में आ जाये...
ऐ बदनसीब मेरी दुआ से तुझे भी किसी से इश्क हो जाये...!!

तेरे  सारे खयाली अरमान टूट कर इस कदर से बिखरे कि,
तू शहर-शहर फिरती हुई उन्हें आँचल में चुनती जाये..
तुझे पहले इश्क हो फिर यकीन हो कि ये मोहब्बत क्या है??
मैं कहता फिरू कि इश्क ढोंग है और तू नहीं-नहीं कहती जाये..
मोहब्बत में तड़पना क्या है.. शायद तुझे समझ में आ जाये...
ऐ बदनसीब मेरी दुआ से तुझे भी किसी से इश्क हो जाये...!!

Monday, December 27, 2010

दिल की बातें..




तेरे ख्यालों की पनाह में, मैं रोज़ एक नज़्म लिखता हूँ..
जब गुनगुनाऊं तन्हाई में, जैसे तुझसे रु-ब-रु होता हूँ..
गुज़रे लम्हों के आगोश में, तेरी बाहें लिपट सी जाती है..
तेरी साँसों की गर्मी में, मैं बर्फ सा पिघलता रहता हूँ...
तेरी आशिकी की पनाह में बेइंतहा मोहब्बत करता रहता हूँ...!!

तेरी नज़रों के मुड़ने पर खुद को आवारा समझता हूँ,
तेरे खामोश लब देखकर खुद को मजबूर समझता हूँ..
तू भले मेरे साये से भी मुँह मोड़कर बैठी रह,
तुझसे दूर होने का इलज़ाम मैं खुद पर ले लेता हूँ..
तेरी आशिकी की पनाह में बेइंतहा मोहब्बत करता रहता हूँ...!!

वो मदहोश बातें, मेरे ज़हन की रगों में मेह्फूस रखता हूँ..
भूल ना जाऊ कहीं, इसलिए कागजों में कैद किये रखता हूँ..
तेरे इश्क की स्याही, मेरी कलम को जंग लगने से बचाती है..
मतलबी दुनिया में, तेरी मोहब्बत का दुशाला ओढ़े रखता हूँ..
तेरी आशिकी की पनाह में बेइंतहा मोहब्बत करता रहता हूँ...!!

तेरी सूरमायी अंखियो में सारी राते गुज़ारा करता हूँ,
बचीखुची यांदो में तेरे हसीन ख्वाब देखा करता हूँ..
होश में होऊ या बेहोश, बस बेखबर सा ताकते हुए,
सुन्न पड़ी धडकनों में भी जगा हुआ रहता हूँ..
तेरी आशिकी की पनाह में बेइंतहा मोहब्बत करता रहता हूँ...!!

बंजर राहो में, तेरे मखमली हाथ बेफिक्र थामे रहता हूँ..
काली रातों में, तुझ दीप की रोशनी जलाये रहता हूँ..
ये सफ़र तय करने में, ऐ हमसफ़र तेरी ज़रूरत पड़ेगी मुझे,
शाख के झूलते पत्तों सा, तेरा अलविदा बुझाते रहता हूँ..
तेरी आशिकी की पनाह में बेइंतहा मोहब्बत करता रहता हूँ...!!

Saturday, October 2, 2010

पिता

कहते है कि भगवान ने इंसान तो बना दिया पर उसे ज़िन्दगी जीना कैसे सिखाये, वो खुद तो सिखा नहीं सकते थे.. तो उन्होंने हमारे साथ रहने के लिए.. सागर से गहरायी, आसमां से विशालता, पहाड़ से कठोरता, फूल से कोमलता और झरने से शीतलता ले दो रचनाएं गढ़ी..!!
दुनिया ने एक को नाम दिया "माँ" और दुसरे को कहा "पिता"...!!

कह के तो नहीं कह सकता.. पर लिख के कहने की हिम्मत जरूर है पापा.. I LOVE YOU VERY MUCH...  
A very-very Happy Birthday PAPA...

A Tribute to all Fathers..       "पिता"




वेद-ग्रन्थ के खुले अध्यायों का, भवसागर है पिता,
मुझ सीप के मोती का, समुन्दर सा जहां है पिता..
स्मरण मात्र से उनके, देवालयों में घंटियाँ बजती है,
ईश्वर-अल्लाह-यीशु है, फिर भी जग जिसे पूजे, वो है पिता...

मुझ बीज को अपनी छाँव में, जिस वृक्ष ने जन्मा वो है पिता,
धूप-तूफ़ान में साया बन, मुझ कलि को खिलाये मेरे पिता..
दफ्तर से आते ही मेरी हंसी से, सारी थकान उड़ जाती है,
अपने बच्चे के रोने पर, जो झूलता पलना बने, वो है पिता...

संस्कार की पाठशाला में, छड़ी ले खड़े रहते है पिता,
कभी गोद तो कभी काँधे पर, उठा मेले घुमाते है पिता..
गलती करने पर उन हाथो को, वज्र बना देखा है,
पैर छूने पर वही हाथ सर पर रख दे, वो है पिता...

माँ के माथे की रौनक, मेरे नाम के सरताज है पिता,
बाज़ार में हर चीज, अपनी लगे जब संग हो पिता..
अपने गुलशन में बहारें सजा, मुझ फूल को महकाया है,
ज़िन्दगी के कांटो पर सख्त, पर मेरे लिए नाज़ुक, वो है पिता...

आप एहसास है, संवेदना है, गालों पर पप्पी है पिता,
स्कूल जाने पर, खिड़की से मुझे अपलक देखते है पिता..
मेरी शरारतों में, अपना बचपना देख मुस्कुराते है,
माँ फिर भी रो दे, पर बेटे के सामने ना रो सके, वो है पिता... 

कैलाश-हरिद्वार, काशी-मथुरा, अमरनाथ है पिता,
मेरी स्याही-दावत और मंत्रो का जाप है पिता..
प्रभात बेला में, चेहरा दिखना मेरा शगुन है पिता,
दिल में बसा है जिसके छुपा  अनंत प्यार, वो है पिता...!!